1.खरीफ प्याज उत्पादन प्रौद्योगिकी

 

खरीफ मौसम की में भारी वर्षा और कम जल निकासी होने के कारन काला धब्बा, बैंगनी धब्बा एवं काला झुलसा जैसी बीमारियों पैदा होती है । इस प्रौद्योगिकी में बीमारी की समस्या को कम करने और स्वस्थ फसल के लिए  प्रथाओं का पालन का संयोजन भी शामिल है ।  जून के पहले सप्ताह में रोपाई के लिए छाया नेट के नीचे ड्रिप या फव्वारा सिंचाई के साथ उंची उठी हुई क्यारीय़ॉ पर  पौढशाला की स्थापना करना । उंची उठी हुई क्यारीय़ॉ पर फव्वारा सिंचाई के साथ पौढशाला की स्थापना से वर्षा जल का निकास अच्छा होता है, जो मिट्टी जनित और पत्ते रोगों की घटनाओं को कम करता है ।
खरीप फसल के लिए में 75:40:40:20 किलो एन.पी.के.एस. / हेक्टेयर + जैविक खाद 75 किग्रा एन / हेक्टेयर के बराबर सिफारिश की है ।
एझोस्पिरीलियम और फॉस्फोरस सोल्युबलाइझिंग बैक्टीरिया प्रति हेक्टेयर 5kg  की सिफारिश की है ।
पीकेएस की पुरी मात्रा और एन की 1/3 की मात्रा पूर्ण रोपाई की समय प्रयोग करना चाहिए और एन के 2/3 शेष रोपाई 30 और 45 दिन के बाद  दो बराबर विभाजन में प्रयोग करना चाहिए ।
क्यारियॉ बनाने से पहले गोबर खाद या वर्मीकम्पोस्ट का इस्तेमाल ट्राइकोडर्मा व्हीरीड के साथ मिट्टी में मिश्रित किए जाने से मिट्टी जनित रोगों की घटनाओं को कम करने में मदद करता है ।
टपक सिंचाई के माध्यम से खाद का प्रयोग करने से अधिक वर्षा की स्थिति में  जो पोषक तत्वों के कमी के नुकसान से बचा जाता है ।: नायट्रोजन की 2/3 की मात्रा रोपाई से ६० दिन तक साप्ताहिक अंतराल पर सात विभाजन में प्रयोग करना चाहिए ।खरपतवारों को उगने से पूर्व खरपतवार नाशक पेन्डामेथलिन @0.2% का अनुप्रयोग.यह तकनीक बल्ब की गुणवत्ता में समझौता किए बिना 25 टन प्रति हेक्टेयर की उपज का सुनिश्चित करता है ।.

  2.प्याज़ एवं लहसुन के लिए सूक्ष्म सिंचन

टपक सिंचाई के लिए, 120 सेँ.मी. चौडी तथा 15 से.मी. उंची क्यारियाँ के बीच 45 सें.मी. की नाली बनाकर 10x15 से.मी. अंतर पर पौधे लगाये ।  पत्येक क्यारीपर दो टपक सिंचाई की नलीयाँ (16 एम.एम. साइज) 60 सें.मी. के अंतर से लगाई जाए। नलीयों में  30 से 50 सें.मी. के बीच टपक लगाए एवं पानी का डीसचार्ज फ्लो 4 ली/अवर होना चाहिए ।फुवार सिंचाई के लिए. सूक्ष्म फुवार का अंतर 6 मी. एवं पानी का डीसचार्ज फ्लो 135 ली/अवर होना चाहिए ।टपक सिंचाई (100 प्रतिशत पॅन इवॅपोरेशन) के प्रयोग के कारन बिक्री योग्य कंद का उत्पादन तुलना में 15-20 प्रतिशत अधिक होता एवं अ क्षेणी के कंद का प्रतिशत भी अधिक होता है, 35-40 प्रतिशत पानी कि बचत होती एवं 25-30 प्रतिशत मजदुरी की बचत होती है ।