अगस्त 2019 के महीने की सलाह

  1. खरीफ प्याज की रोपाई के लिए

यदि अब तक खरीफ की रोपाई की गई हों, इसे अभी निम्नलिखित विधियों के अनुसार कर लेनी चाहिए।

  1. खेत में हल से जुताई करनी चाहिए ताकि पिछली फसल के बचे अवशेष एवं पत्थर हट जाए और ढे़ले टूटकर मिट्टी भूरभूरी हो जाएं।
  2. सड़ी हुई गोबर खाद 15 ./हे. या मुर्गी खाद 7.5 ./हे. या केंचूए की खाद 7.5 ./हे. आखिरी जुताई के समय डालनी चाहिए तथा क्यारियां बनाने से पूर्व खेत को समान स्तर पर लाना चाहिए।
  3. चौड़ी उठी हुई क्यारियां जिनकी ऊंचाई 15 सें.मी. और चौड़ाई 120 सें.मी. हो और नाली 45 सें.मी. हो, तैयार करनी चाहिए। नाली से अतिरिक्त जल बह जाता है जिससे काला धब्बा (ऐन्थ्राक्नोज) रोग के प्रकोप को कम करने में मदद होगी।
  4. चौड़ी उठी हुई क्यारियां बनाने की तकनीक टपक और फव्वारा सिंचाई के लिए उपयुक्त है।
  5. टपक सिंचाई के लिए हर चौड़ी उठी हुई क्यारी में 60 सें.मी. की दूरी पर दो टपक लेटरल नालियां (16 मि.मी. आकार) अंतर्निहित उत्सर्जकों के साथ होनी चाहिए। दो अंतर्निहित उत्सर्जको के बीच की दूरी 30-50 सें.मी. और प्रवाह की दर 4 लिटर / घंटा होनी चाहिए।
  6. फव्वारा सिंचाई के लिए दो लेटरल (20 मि.मी.) के बीच की दूरी 6 मी. और निर्वहन दर 135 लिटर / घंटा होनी चाहिए।
  7. रासायनिक उर्वरक नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश को 75 : 40 : 40 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की जरूरत है। अगर मिट्टी में पहले से गंधक स्तर 25 कि. ग्रा. / हे. से अधिक है, तब 30 कि. ग्रा. / हे. और यदि यह 25 कि. ग्रा. / हे. से नीचे है, तब 45 कि. ग्रा. / हे. गंधक का इस्तेमाल करें। नत्रजन 25 कि. ग्रा. तथा फॉस्फोरस, पोटाश एवं गंधक की पूरी मात्रा रोपाई के समय देनी चाहिए। नत्रजन की उर्वरित मात्रा दो समान भागों में रोपाई के 30 एवं 45 दिनों के बाद देनी चाहिए।
  8. यदि प्याज के लिए टपक सिंचाई प्रणाली का प्रयोग किया गया है, तब 25 कि. ग्रा. नत्रजन रोपाई के समय आधारिय मात्रा के रूप में और उर्वरित नत्रजन का इस्तेमाल छह भागों में रोपाई के 60 दिनों बाद तक 10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। फॉस्फोरस, पोटाश और गंधक का इस्तेमाल आधारिय रूप में रोपाई के समय किया जाना चाहिए।
  9. जैविक उर्वरक ऐजोस्पाइरिलियम और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु, दोनों की 5 कि. ग्रा. / हे. की दर से आधारीय मात्रा के रूप में अकार्बनिक उर्वरकों के साथ ड़ालने की सिफारिश की गई है।
  10. खरपतवार नियंत्रण के लिए ऑक्सिफ्लोरोफेन 23.5% इसी (1.5-2 मि.ली./लिटर) या पेंडीमिथालीन 30% इसी (3.5-4 मि.ली/लिटर) का इस्तेमाल रोपाई से पहले या रोपाई के समय करना चाहिए।
  11. लगभग 35-40 दिनों के पौधों की रोपाई पंक्तियों के बीच 15 सें. मी. और पौधों के बीच 10 सें. मी. अंतर रखकर करनी चाहिए।
  12. रोपाई के लिए पौध का चयन करते समय उचित ध्यान रखना चाहिए। कम और अधिक आयु की पौध को रोपाई के लिए नहीं लेना चाहिए। रोपाई के पहले पौध के शीर्ष का एक तिहाई हिस्सा काट देना चाहिए।
  13. फफूंदी रोगों के प्रकोप को कम करने के लिए पौध की जड़ो को कार्बेन्डाज़िम के घोल (0.10%) में दो घंटे डूबोने के बाद रोपित किया जाना चाहिए।
  14. रोपाई के समय तथा रोपाई के तीन दिन बाद सिंचाई करें ताकि पौध अच्छी तरह स्थापित हो सकें।

. खरीफ प्याज की खड़ी फसल के लिए

  1. अगर निरंतर वर्षा होती है, तब अतिरिक्त पानी ठीक तरह से बाहर निकलना चाहिए ताकि काला धब्बा रोग के प्रकोप से पौध को बचाया जा सकें।
  2. रोपाई के 30 दिन बाद 25 कि. ग्रा. / हे. की दर से नत्रजन दिया जाना चाहिए।
  3. खेत से नत्रजन बह जाने से अगर खेत में नत्रजन की कमी के लक्षण (पत्तों का पीलापन) दिखाई दें, तब नत्रजन की कमी को पूरा करने के लिए यूरिया का 10 ग्रा./ लिटर की दर से पत्तोंपर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।
  4. यदि तीन दिन लगातार वर्षा होती है, सापेक्षिक आर्द्रता 85% से अधिक है या बादल छाए हुए हैं, किसानों को काला धब्बा रोग के रोकथाम के लिए बेनोमिल का 0.2% की दर से उचित छिड़काव करना चाहिए।
  5. बेनोमिल के छिड़काव के 15 दिन बाद मैन्कोज़ेब (2.5 ग्रा./ लिटर) के साथ मिथोमिल (0.8 ग्रा./ लिटर) का छिड़काव करने की सिफारिश की गई है। इससे पर्णीय रोग एवं थ्रिप्स के प्रकोप से पौधे को बचाया जा सकता है।

. पछती खरीफ प्याज की पौधशाला तैयार करने के लिए

पछेती खरीफ प्याज की पौधशाला तैयार करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

  1. एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए पौध प्राप्त करने हेतु लगभग 5-7 कि.ग्रा. बीज को 0.05 हेक्टेयर में बो कर पौधशाला तैयार करने की आवश्यकता होती है
  2. गहरी जुताई की सिफारिश की गई है, जिससे कि कीट के कोश खरपतवार के बीज सूर्य के प्रकाश से नष्ट हो जाएं।
  3. क्यारियां तैयार करने से पहले पिछली फसल के बचे हुए अवशेष, खरपतवार और पत्थर हटा देना चाहिए
  4. अच्छी तरह से सड़ी हुई आधा टन गोबर की खाद 0.05 हेक्टेयर में डालें।
  5. पौधशाला के लिए 10-15 सें.मी. ऊंचाई, 1 मी. चौड़ाई और सुविधा के अनुसार लंबाई की उठी हुई क्यारियां तैयार की जानी चाहिए
  6. पौधशाला में खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के तुरंत बाद 0.2% पेंडीमिथालिन के इस्तेमाल की सिफारिश की गई है। यह खरपतवारों को उगने से पूर्व नष्ट कर देता है।
  7. बुवाई से पहले बीज का उपचार कार्बेन्डाज़िम 1-2 ग्रा./ कि.ग्रा. बीज की दर से करें। यह मृदा जनित रोगों से बचने में सहायता करता है।
  8. आर्द्र गलन से बचने एवं स्वस्थ पौध प्राप्त करने के लिए ट्रायकोडरमा विरीडी का 1250 ग्रा./ हे. की दर से उपयोग करने की भी सिफारिश की गई है।
  9. बीज बोने से पहले नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश का 4:1:1 कि.ग्रा./ 500 वर्ग मीटर की दर से इस्तेमाल करें।
  10. बीज 50 मि.मी. से 75 मि.मी. के अंतर पर कतार में बोया जाना चाहिए। बुवाई के बाद बीज को अच्छी तरह सड़ी हुई महीन गोबर खाद या कम्पोस्ट से ढका जाना चाहिए और फिर हल्के पानी का छिड़काव करना चाहिए। टपक या फव्वारा सिंचाई की सिफारिश की गई है।
  11. बुवाई के 20 दिनों के बाद हाथ से निराई करना चाहिए।
  12. निराई के बाद 2 कि.ग्रा./ 500 वर्ग मीटर की दर से नत्रजन देना चाहिए।
  13. मृदा जनित रोगों के नियंत्रण के लिए बुवाई के 15 दिन पश्चात मेटालेक्सिल का 0.2% की दर से घोल बनाकर पौध के पास मिट्टी में डालना चाहिए। पत्तों पर रोगों का प्रकोप दिखाई देने पर मैन्कोज़ेब या ट्राईसायक्लाज़ोल या हेक्साकोनाज़ोल का 0.1% की दर से पत्तों पर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।
  14. थ्रिप्स का प्रकोप ज्यादा होने पर फिप्रोनील या प्रोफेनोफॉस का 1 मि.ली./ लिटर की दर से पत्तों पर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।

. भंडारित प्याज एवं लहसुन कंदों के लिए

  1. भंडारित कंदों की प्रस्फुटन एवं सड़न के लिए नियमित रूप से निगरानी की जानी चाहिए। यदि सड़े या संक्रमित कंद दिखाई दे तो उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए। सुनिश्चित करें कि भंडार गृह में हवा का आवागमन उचित है
  2. लगभग 4-5 फीट का ढ़ेर बनाकर प्याज के कंदों को अच्छी तरह से फैलाकर रखना चाहिए।
  3. लहसुन के कंदों को पत्तों के साथ हवादार भंडार गृह में लटकाकर अथवा ऊपर की ओर कम होते हुए गोलाकार ढ़ेर बनाकर भंडारित करना चाहिए।

टिप्पणी: प्रोफेनोफॉस, फिप्रोनील एवं मिथोमिल का प्रयोग थ्रिप्स द्वारा नुकसान के लक्षण दिखाई देने पर ही करें। मेटालेक्सिल, बेनोमिल, मैन्कोज़ेब, हेक्साकोनाज़ोल, एवं ट्राईसायक्लाज़ोल का प्रयोग रोग के लक्षण दिखाई देने पर ही करें।