अक्टूबर 2019 के महीने की सलाह

 

वर्तमान में खरीफ प्याज की फसल खेत में खड़ी है और पछेती खरीफ प्याज की रोपाई होने वाली है

यह समय रबी प्याज की पौधशाला तैयार करने का भी है प्याज के कंदों तथा लहसुन की कलियों का रोपण सामान्य रूप से अक्टूबर में किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में निम्नलिखित सलाह का पालन करना चाहिए।

 

अ.     खरीफ प्याज की खड़ी फसल  के लिए

1. अगर निरंतर वर्षा होती है, तब अतिरिक्त पानी ठीक तरह से बाहर निकलना चाहिए ताकि काला धब्बा रोग

     के प्रकोप से फसल को बचाया जा सकें। वर्षा कम होने की स्थिति में इस वेबसाइट परएग्रोपीडियाके तहत दी

     गई सलाह का पालन करें।

2.  रोपाई के 60 एवं 75 दिनों के बाद पत्तों पर 5 ग्रा. / लिटर की मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्वों के मिश्रण के

     छिड़काव की सिफारिश की गई है।

3.   अगर खेत में नत्रजन की कमी के लक्षण (पत्तों का पीलापन) दिखाई दें, तब यूरिया का 10 ग्रा./लिटर की दर से   

      पत्तों पर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।

4.   रोपाई के 45 दिनों के बाद मिथोमिल (0.8 ग्रा./लिटर) में मैन्कोज़ेब (2 ग्रा./ लिटर) मिलाकर छिड़काव करने   

      की सिफारिश की गई है। इससे पर्णीय रोग एवं थ्रिप्स के प्रकोप की रोकथाम में सहायता होगी

5.   पहले छिड़काव के 10-15 दिनों के बाद जरूरत के अनुसार कार्बोसल्फान (2.5 मि.ली./ लिटर) और

      ट्राईसायक्लाज़ोल (1 ग्रा./ लिटर) की सिफारिश की गई है।

6.   यदि उपर दिए गए छिड़काव के बाद भी थ्रिप्स और पर्णीय रोगों की रोकथाम नहीं होती है, तब प्रोफेनोफॉस

     (1मि.ली./ लिटर) और हेक्साकोनाज़ोल (1 ग्रा. / लिटर) का छिड़काव करें।

 

 .   पछेती खरीफ प्याज की रोपाई के लिए

1.  खेत में हल से जुताई करनी चाहिए ताकि पिछली फसल के बचे अवशेष हट जाए और ढ़ेले टूटकर 

मिट्टी भुरभुरी हो जाए।

2.   सड़ी हुई गोबर खाद 15 ./ हे. या मुर्गी खाद 7.5 ./ हे. या केंचूए की खाद 7.5 ./ हे. आखिरी जुताई के

      समय डालनी चाहिए तथा क्यारियां बनाने से पहले खेत को ठीक तरह से समतल करना चाहिए।

3.   चौड़ी उठी हुई क्यारियां जिनकी ऊंचाई 15 से.मी. और चौड़ाई 120 से.मी. हो और नाली 45 से.मी. हो, तैयार  

       करनी चाहिए। नाली से अतिरिक्त जल बाहर निकाला जा सकता है जिससे काला धब्बा (ऐन्थ्राक्नोज) रोग के

       प्रकोप को कम करने में मदद होगी। यह तकनीक टपक और फव्वारा सिंचाई के लिए उपयुक्त है।

4.   टपक सिंचाई के लिए हर चौड़ी उठी हुई क्यारी में 60 सें.मी. की दूरी पर दो टपक लेटरल नालियां (16 मि.मी.   

      आकार) अंतर्निहीत उत्सर्जकों के साथ होनी चाहिए। दो अंतर्निहीत उत्सर्जकों के बीच की दूरी 30-50 सें. मी.

      और प्रवाह की दर 4 लिटर / घंटा होनी चाहिए।

5.   फव्वारा सिंचाई के लिए दो लेटरल (20 मि.मी.) के बीच के दूरी 6 मी. और निर्वहन दर 135 लिटर / घंटा होनी

      चाहिए।

6.   रासायनिक उर्वरकों नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश को 110 : 40 : 60 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की 

     जरूरत है। अगर मिट्टी में पहले से गंधक स्तर 25 कि. ग्रा. / हे. से अधिक है, तब 15 कि. ग्रा. / हे. और  

     यदि यह 25 कि. ग्रा. / हे. से नीचे है, तब 30 कि. ग्रा. / हे. गंधक का इस्तेमाल करें।

7.  नत्रजन 40 कि. ग्रा. तथा फॉस्फोरस, पोटाश एवं गंधक की पूरी मात्रा रोपाई के समय देनी चाहिए। नत्रजन  

     की उर्वरित मात्रा दो समान भागों में रोपाई के 30 एवं 45 दिनों के बाद देनी चाहिए।

8.   यदि प्याज के लिए टपक सिंचाई प्रणाली का प्रयोग किया गया है, तब 40 कि. ग्रा. नत्रजन रोपाई के समय आधारिय मात्रा के रूप में और उर्वरित नत्रजन का इस्तेमाल छह भागों में रोपाई के 60 दिनों बाद तक  10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। फॉस्फोरस, पोटाश और गंधक का इस्तेमाल आधारिय रूप में रोपाई के समय किया जाना चाहिए।

9.   जैविक उर्वरक ऐजोस्पाइरिलियम  और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु, दोनों की 5 कि. ग्रा. / हे. की दर से आधारीय मात्रा के रूप में अकार्बनिक उर्वरकों के साथ ड़ालने की सिफारिश की गई है।

10.       खरपतवार नियंत्रण के लिए ऑक्सिफ्लोरोफेन 23.5% ईसी (1.5-2 मि.ली./लिटर) या पेंडीमिथालीन 30% ईसी (3.5-4 मि.ली/लिटर) का इस्तेमाल रोपाई से पहले या रोपाई के समय करना चाहिए।

11.       लगभग 35-40 दिनों के पौधों की रोपाई पंक्तियों के बीच 15 सें.मी. और पौधों के बीच 10 से.मी. अंतर रखकर करनी चाहिए।

12.       रोपाई के लिए पौध का चयन करते समय उचित ध्यान रखना चाहिए। कम और अधिक आयु की पौध रोपाई के लिए नहीं लेनी चाहिए। रोपाई के पहले पौध के शीर्ष का एक तिहाई हिस्सा काट देना चाहिए।

13.       फफूंदी रोगों के प्रकोप को कम करने के लिए पौध की जड़ों को कार्बेन्डाज़िम के घोल (0.1%) में दो घंटे डूबोने के बाद रोपित किया जाना चाहिए।

14.       रोपाई के समय तथा रोपाई के तीन दिन बाद सिंचाई करें ताकि पौध अच्छी तरह स्थापित हो सकें।

 

.   रबी प्याज की पौधशाला तैयार करने के लिए

      रबी प्याज की पौधशाला तैयार करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

1.   एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए पौध प्राप्त करने हेतु लगभग 5-7 कि.ग्रा. बीज को 0.05 हेक्टेयर में बो कर  

      पौधशाला तैयार करने की आवश्यकता है।

2.   गहरी जुताई की सिफारिश की गई है, जिससे कि कीट के कोश खरपतवार के बीज सूर्य के प्रकाश में

      आकर नष्ट हो जाएं।

3.  क्यारियां तैयार करने से पहले पिछली फसल के बचे हुए अवशेष और खरपतवार हटा देने चाहिएं।

4.  अच्छी तरह से सड़ी हुई आधा टन गोबर की खाद 0.05 हेक्टेयर में ड़ाले।

5.  पौधशाला के लिए 10-15 से.मी. ऊंचाई, 1 मी. चौड़ाई और सुविधा के अनुसार लंबाई की उठी हुई

     क्यारियां तैयार की जानी चाहिए।

6.  पौधशाला में खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के तुरंत बाद 0.2% पेंडीमिथालिन के इस्तेमाल की

     सिफारिश की गई है। यह खरपतवारों को उगने से पूर्व नष्ट कर देती है।

7.   बुवाई से पहले बीज का उपचार कार्बेन्डाज़िम 1-2 ग्रा./ कि.ग्रा. बीज की दर से करें। यह मृदा जनित

      रोगों से बचने में सहायता करता है।

8.   आर्द्र गलन से बचने एवं स्वस्थ पौध प्राप्त करने के लिए ट्रायकोडरमा विरीडी का 1250 ग्रा./ हे. की दर से

    उपयोग करने की भी सिफारिश की गई है।

9.   बीज बोने से पहले नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश का 4:1:1 कि.ग्रा./500 वर्ग मीटर की दर से इस्तेमाल  करें।

10.       बीज 50 मि.मी. से 75 मि.मी. के अंतर पर कतार में बोया जाना चाहिए। बुवाई के बाद बीज को

   अच्छी तरह सड़ी हुई महीन गोबर की खाद या कम्पोस्ट से का जाना चाहिए और फिर हल्के     

       पानी का छिड़काव करना चाहिए। टपक या फव्वारा सिंचाई की सिफारिश की गई है।

11.       मृदा जनित रोगों के नियंत्रण के लिए बुवाई के 15 दिन पश्चात मेटालेक्सिल का 0.2% की दर से घोल    बनाकर पौध के पास मिट्टी में डालना चाहिए।

12.      बुवाई के 20 दिनों के बाद हाथ से निराई करना चाहिए।

13.      निराई के बाद 2 कि.ग्रा./ 500 वर्ग मीटर की दर से नत्रजन देना चाहिए।

14.      थ्रिप्स का प्रकोप ज्यादा होने पर फिप्रोनील या प्रोफेनोफॉस का 1मि.ली./लिटर की दर से पत्तों पर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।

15. पत्तों पर रोगों का प्रकोप दिखाई देने पर मैन्कोज़ेब या ट्राईसायक्लाज़ोल या हेक्साकोनाज़ोल का 0.1%

      की दर से पत्तों पर छिड़काव करने की सिफारिश की गई है।

 

 . लहसुन के रोपण हेतु खेत की तैयारी

      निम्नलिखित सिफारिश की गई विधियों के अनुसार खेत की तैयारी करें।

1.     खेत में हल से जुताई करनी चाहिए ताकि पिछली फसल के बचे अवशेष हट जाएं और ढेले टूटकर मिट्टी भूरभूरी हो जाए।

2.    सड़ी हुई गोबर खाद 15 ./हे. या मुर्गी खाद 7.5 ./हे. या केंचूए की खाद 7.5 ./हे. आखिरी जुताई के समय डालनी चाहिए तथा क्यारियां बनाने से पहले खेत को समान ठीक तरह से समतल करना चाहिए।

3.    रासायनिक उर्वरक नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश : गंधक को 75 : 40 : 40 : 40 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की जरूरत है। नत्रजन 25 कि. ग्रा. तथा फॉस्फोरस, पोटाश एवं गंधक की पूरी मात्रा रोपण के समय देनी चाहिए। नत्रजन की उर्वरित मात्रा दो समान भागों में रोपाई के 30 एवं 45 दिनों के बाद देनी चाहिए।

4.    यदि लहसुन के लिए टपक सिंचाई का प्रयोग किया गया है। तब 25 कि. ग्रा. नत्रजन रोपण के समय आधारिय मात्रा के रूप में और उर्वरित नत्रजन का इस्तेमाल छह भागों में रोपण के 60 दिनों बाद तक 10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। फॉस्फोरस, पोटाश और गंधक का इस्तेमाल आधारिय रूप में रोपण के समय किया जाना चाहिए।

5.    जैविक उर्वरक ऐजोस्पाइरिलियम और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु, दोनों की 5 कि. ग्रा. / हे. की दर से आधारिय मात्रा के रूप में अकार्बनिक उर्वरकों के साथ डालने की सिफारिश की गई है।

6.    खरपतवार नियंत्रण के लिए ऑक्सिफ्लोरोफेन 23.5% ईसी (1.5-2 मि.ली./लिटर) या पेंडीमिथालीन 30% ईसी (3.5-4 मि.ली/लिटर) का इस्तेमाल रोपाई से पहले या रोपाई के समय करना चाहिए

7.    रोपण के लिए लगभग 1.5 ग्रा. की बड़ी कलियों का चयन करना चाहिए। छोटी, रोग से ग्रसित एवं क्षतिग्रस्त कलियों को रोपण के लिए  नहीं चुनना चाहिए।  

8.    फफूंदी रोगों के प्रकोप को कम करने के लिए कलियों को कार्बेन्डाज़िम के घोल (0.1%) में दो घंटे उपचारित करना चाहिए।

9.    कलियों को सीधे रखकर मृदा के 2 से.मी. नीचे रोपित करना चाहिए तथा पौधों के बीच 10 से.मी. और पंक्तियों के बीच 15 से.मी अंतर रखना चाहिए। लहसुन के लिए बीज का दर 400-500 कि.ग्रा./हे. होना चाहिए।

10.  चौड़ी उठी हुई क्यारियां जिनकी ऊंचाई 15 से.मी. और चौड़ाई 120 से.मी. हो और नाली 45 से.मी. हो, तैयार करनी चाहिए। यह तकनीक टपक और फव्वारा सिंचाई के लिए उपयुक्त है।

11.  टपक सिंचाई के लिए हर चौड़ी उठी हुई क्यारी में 60 से.मी. की दूरी पर दो टपक लेटरल नालियां (16 मि.मी. आकार) अंतर्निहीत उत्सर्जकों के साथ होनी चाहिए। दो अंतर्निहीत उत्सर्जकों के बीच की दूरी 30-50 सें.मी. और प्रवाह की दर 4 लिटर / घंटा होनी चाहिए।

12.  फव्वारा सिंचाई के लिए दो लेटरल (20 मि.मी.) के बीच की दूरी 6 मी. और निर्वहन दर 135 लिटर / घंटा होनी चाहीए।

 

. बीज उत्पादन हेतु प्याज कंदों का रोपण करने के लिए

1.   रोपण से पहले खेत में हल से जुताई करनी चाहिए ताकि पिछली फसल के बचे अवशेष हट जाएं और ढेले टूटकर मिट्टी भुरभुरी हो जाए।

2.    सड़ी हुई गोबर खाद 15 ./ हे. या मुर्गी खाद 7.5 ./ हे. या केंचूए की खाद 7.5 ./ हे. आखिरी जुताई के समय डालनी चाहिए।

3.    रोपण के लिए 60 सें.मी. के अंतर पर क्यारियां तैयार करनी चाहिए।

4.    रासायनिक उर्वरको नत्रजन : फॉस्फोरस : पोटाश : गंधक को 110 : 50 : 50:50 कि. ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की जरूरत है। एक तिहाई नत्रजन एवं फॉस्फोरस, पोटाश और गंधक की पूरी मात्रा रोपण के समय देनी चाहिए जबकि उर्वरित दो तिहाई नत्रजन की मात्रा दो समान भागों में रोपण के 30 एवं 45 दिनों देना चाहिए।

5.   यदि टपक सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है, तब 35 कि. ग्रा. नत्रजन रोपण के समय आधारिय मात्रा के रूप में और उर्वरित नत्रजन का इस्तेमाल छह भागों में रोपण के 60 दिनों बाद तक 10 दिनों के अंतराल पर टपक सिंचाई के माध्यम से किया जाना चाहिए।

6.   जैविक उर्वरक ऐजोस्पाइरिलियम और फॉस्फोरस घोलनेवाले जीवाणु, दोनों की 5 कि. ग्रा. / हे. की दर से आधारिय मात्रा के रूप में अकार्बनिक उर्वरकों के साथ डालने की सिफारिश की गई है।

7.   खरपतवार नियंत्रण के लिए ऑक्सिफ्लोरोफेन 23.5% ईसी (1.5-2 मि.ली./लिटर) या पेंडीमिथालीन 30% ईसी (3.5-4 मि.ली/लिटर) का इस्तेमाल रोपण से पहले या रोपण के समय करना चाहिए

8.    लगभग 50-60 ग्रा. के मध्यम आकार के कंदों का चयन रोपण के लिए करना चाहिए। छोटे, रोग से ग्रसित एवं क्षतिग्रस्त कंदों को रोपण के लिए नहीं लेना चाहिए। कंदों के आकार के अनुसार कंद बीज की दर में बदलाव आता है। कंद बीज का दर 3-3.5 ./हे. है।

9.   फफूंदी रोगों के प्रकोप को कम करने के लिए कंदों को कार्बेन्डाज़िम के घोल (0.1%) में उपचारित करना चाहिए। उपचार के पहले कंद का एक तिहाई हिस्सा काट देना चाहिए।

10.         कंदों को क्यारी के बाजूओं पर पौधों के बीच 20 सें.मी. अंतर रखकर रोपित करना चाहिए।

 

. भंडारित प्याज एवं लहसुन कंदों के लिए

1.    भंडारित कंदों की प्रस्फुटन एवं सड़न के लिए नियमित रूप से निगरानी की जानी चाहिए। यदि सड़े या संक्रमित कंद दिखाई दें तो उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए। सुनिश्चित करें कि भंडार गृह में हवा का आवागमन उचित है

2.    लगभग 4-5 फीट का ढ़ेर बनाकर प्याज के कंदों को अच्छी तरह से फैलाकर रखना चाहिए।

3.    लहसुन के कंदों को पत्तों के साथ हवादार भंडार गृह में लटकाकर अथवा ऊपर की ओर कम होते हुए गोलाकार ढेर बनाकर भंडारित करना चाहिए।

 

टिप्पणी: कार्बोसल्फान, प्रोफेनोफॉस, फिप्रोनील एवं मिथोमिल का प्रयोग थ्रिप्स द्वारा नुकसान के लक्षण दिखाई देने पर ही करें। मैन्कोज़ेब, हेक्साकोनाज़ोल, प्रोपिकोनाज़ोल एवं ट्राईसायक्लाज़ोल का प्रयोग रोग के लक्षण दिखाई देने पर ही करें।